Sunday, November 18, 2012

मस्त किस धुन में पड़े हो तुम लिए आशा लता |
कौन थे क्या हो गए ! है आज इसका भी पता ||

पड़ गयी आदत तुम्हे यह ! क्यों निरंतर ह्रास की |
कुछ खबर भी तुम्हे अपने विगत इतिहास की ||

शिल्प में जो श्रेष्ठ गृह, मंदिर, यहाँ होगे खड़े |
आज वे सब नष्ट होकर खंडहर से है पड़े ||

आह ! क्या बाकी रहा इतना अभी विष-कौर है |
क्या हमारी भाग्य पुस्तक में लिखा यह और है ||

थे यहाँ सर्वत्र मंदिर, किन्तु वह सब गिर पड़े |
पर इकत्तीस दीर्ध लघु अवशेष है अब भी खड़े ||

किन्तु इनकी रेख-रक्षा का ना ठीक प्रवंध है |
और उल्टा लग रहा सरकार का प्रतिवंध है ||

किन्तु इस बहुमूल्य संपत्ति का न हमको ध्यान है |
आज तो वैभव हमारा हो रहा अज्ञान है ||

भेद तक भूले की क्या उत्थान ! क्या अपमान है |
चेतिए ! उन्नति नहीं, यह गर्त का सौपान है ||

आज से लगभग २५ साल पहले जब वर्तमान के वर्धमान सम आचार्य विद्यासागर जी महाराज यहाँ पहुचे तो यत्र-तत्र बिखरी पड़ी जैन पुरा सम्पदा को देखकर द्रवीभूत हो उठे एवं समाज के बार बार निवेदन पर अपना पावन आशीर्वाद एवं प्रेरणा देकर क्षेत्र जीर्रोधार के लिए अपने शिष्य मुनि श्री सुधासागर जी को भेजा | मुनि श्री सुधासागर श्री के सानिध्य में आज से लगभग २० साल पहले क्षेत्र जीर्रोधार हुआ तब से यह क्षेत्र लगातार प्रगति पर है पर अभी भी बहुत कुछ होना बाकी है जिसके लिए यह क्षेत्र पुन: आचार्य श्री की और देख रहा है क्योकि आचार्य महाराज के आगमन को २५ साल भी तो हो गए है ,
यह काव्य आज से लगभग ३५-४० साल पहले लिखा गया मालूम होता है |
(इस काव्य के लेखक कल्याणकुमार शशि है, एवं यह काव्य
“बुंदेलखंड का जैन कला केंद्र देवगढ दर्शन” पुस्तक से लिया है)

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