एक विचारणीय प्रश्न ?
(कोई भी प्रतिक्रिया देने के पूर्व पूरा लेख अच्छे से पढ़ ले और सिर्फअपनी सकारात्मक एवं रचनात्मक सुझाव ही दे )
हिन्दू समाज में अभी हाल ही में कुम्भ मेले में प्रकट हुए फर्जी शंकराचार्यों के कारन सही शंकराचार्य को भी राज्य सरकार ने उचित सम्मान नहीं दिया एवं फर्जी शंकराचार्यों के कारण सही शंकराचार्य को कुम्भ मेले में से हटना पड़ा | क्या हमारी जैन समाज, हमारे धर्म में प्रकट हुए फर्जी आचार्यो के सम्बन्ध में कुछ निर्णय ले पायेगी अन्यथा कल के दिन सच्चे साधुओ को भी इन फर्जी आचार्यो के कारन हम लोग सही-गलत का निर्णय बहुमत एवं आगम का ज्ञान ना होने के अभाव में ना कर सके | क्योकि आज फर्जी आचार्य भी कुकरमुत्तो की तरह जैन धर्म में पैदा हो गए है |
ये फर्जी आचार्य और कोई नहीं बल्कि वह आचार्य है जो अपने गुरु के द्वारा आचार्य पद छोरने के पूर्व ही आचार्य बन बैठे है, आगम में आज तक किसी भी गुरु ने अपने पद को छोरे बिना अपने शिष्य को वह पद नहीं दिया | यह नीति साधुओ को तो छोरिये सामान्य प्रजा भी अपने परिवारों में अपनाती है पर चूकि यहाँ हमारे पूज्य आचार्यो पर कलंक की तरह ये फर्जी आचार्य प्रकट हो गए है, जिनसे धर्म एवं समाज का विघटन ही होगा और हो रहा है इसलिए इस पर हम सबको निर्णय लेना ही होगा |
यह फर्जी आचार्य भी अपने आपको सही साबित करने के लिए सही आचार्यो के चित्र अपनी प्रवचन सभा में लगवाएगे, उनकी जयजयकार करेंगे और धीरे से सच्चे आचार्यो की आड़ में अपनी फर्जी परंपरा को पुष्ट करेंगे| अगर आप इसके पीछे का सच जानेगे तो कुछ गुरु-शिष्यों को तुरंत कपरे पहनादेंगे एवं पुलिस के हवाले कर देंगे......पर इसमें सबसे ज्यादा दोष है उन राष्टीय संस्थाओ के पदाधिकरियो का जिन्होंने सत्य को समाज के सामने नहीं आने दिया और ऐसे गुरु-शिष्यों को उनके काले कारनामो का उजागर करने का भय दिखाकर आज भी ब्लेकमेल किया जा रहा है !
आज हम जैन एकता की बाते करते है पर ध्यान रखिये की जो हमारे दिशा निर्देशक है वह ही अगर कलंकित हो जाए तो धर्म एवं समाज दोनों के लिए यह गर्त में ले जाने वाले होंगे -
हम क्यों नीचे जा रहे है आज....
हमारी बात सरकार क्यों नहीं सुनती ....
जैन समाज में एकता क्यों नहीं है ....
क्यों वर्तमान में जो एक साधू कहता है, कुछ साधू उसे गलत कह रहे है और हम आगम का ज्ञान न होने से तटस्थ बने हुए है ....
क्योकि इन फर्जी आचार्यो ने अपने आपको सही साबित करने के लिए हर तरीका अपना लिया है और कुकरमुत्तो की तरह उगकर ये आज धर्म एवं सारे समाज को गर्त में ले जा रहे है
बंधुओ आज भी वीसवी सदी के प्रथ्माचार्य चा. च. शांतीसागर जी की परंपरा निर्विवाद चल रही है, इसमें आचार्य विद्यासागर जी, वर्धमान सागर जी, विद्यानंद जी प्रसिद्ध आचार्य है एवं इसी प्रकार आचार्य शान्तिसागर जी छाणी जी की परंपरा में पूज्य आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज प्रमुख है ............
क्या मुनि नियमसागर जी, क्षमासागर जी, सुधासागर जी, समतासागर जी, प्रमाणसागर जी एवं अन्य लगभग १०० से ऊपर साधू जो की २५ से ३५ साल पहले दीक्षीत है, में ज्ञान कम है जो वो आचार्य नहीं बने या गुरु में बुराई है ..........क्या आचार्य कुन्दकुन्द, समन्तभद्र, जिनसेन, वीरसेन, अकलंकदेव आदि में खोट है जो उन्होंने पद को त्यागे विना अपने शिष्यों को आचार्य नहीं बनाया, और न ही इस प्रकार शिष्य बने !
इन सच्चे साधुओ को नीचा दिखाने की कोशिश हो रही है, कहा जा रहा है की देखो तुम्हारे गुरु ने तुम्हे क्या दिया ? हमारी परंपरा में आओ और आचार्य क्या.........गराधीपति गर्धराचार्य कहलाओ ............हमें देखो जो खुले सांड (विना किसी कि आज्ञा) जैसे घूम रहे है....न किसी की आज्ञा चाहिए, ना किसी का ज्ञान और हम स्वयं भगवान
अगर मेरे लिखने से किसी को बुरा लगा हो तो आपकी क्षमा का पात्र हु,
"अभी समय है सुधार कर लो ये आनाकानी नहीं चलेगी ,
सही की नक़ली मुहर लगाकर ग़लत कहानी नहीं चलेगी ,
घमण्डी वक़्तों के बादशाहों बदलते मौसम की नब्ज़ देखो ,
महज़ तुम्हारे इशारों पे अब हवा सुहानी नहीं चलेगी ,
किसी की धरती,किसी की खेती,किसी की मेहनत,फ़सल किसी की ,
जो बाबा आदम से चल रही थी , वो बेईमानी नहीं चलेगी | (Uday Prapat ji)
कोई भी मूल्य एवं संस्कृती तब तक जीवित नहीं रह सकती, जब तक की वह आचरण में न हो !
झूठ कहते है वह लोग जो दूसरे सम्प्रय्दाय के उदय को अपनी आस्था के पतन का
कारन मानते है,
आस्था तुम्हारी थी, वह डिग कैसे सकती है ?
और यदि तुम्हारी आस्था को सत्य का आधार नहीं है तो उसका पतन होना ही चाहिए..
(कोई भी प्रतिक्रिया देने के पूर्व पूरा लेख अच्छे से पढ़ ले और सिर्फअपनी सकारात्मक एवं रचनात्मक सुझाव ही दे )
हिन्दू समाज में अभी हाल ही में कुम्भ मेले में प्रकट हुए फर्जी शंकराचार्यों के कारन सही शंकराचार्य को भी राज्य सरकार ने उचित सम्मान नहीं दिया एवं फर्जी शंकराचार्यों के कारण सही शंकराचार्य को कुम्भ मेले में से हटना पड़ा | क्या हमारी जैन समाज, हमारे धर्म में प्रकट हुए फर्जी आचार्यो के सम्बन्ध में कुछ निर्णय ले पायेगी अन्यथा कल के दिन सच्चे साधुओ को भी इन फर्जी आचार्यो के कारन हम लोग सही-गलत का निर्णय बहुमत एवं आगम का ज्ञान ना होने के अभाव में ना कर सके | क्योकि आज फर्जी आचार्य भी कुकरमुत्तो की तरह जैन धर्म में पैदा हो गए है |
ये फर्जी आचार्य और कोई नहीं बल्कि वह आचार्य है जो अपने गुरु के द्वारा आचार्य पद छोरने के पूर्व ही आचार्य बन बैठे है, आगम में आज तक किसी भी गुरु ने अपने पद को छोरे बिना अपने शिष्य को वह पद नहीं दिया | यह नीति साधुओ को तो छोरिये सामान्य प्रजा भी अपने परिवारों में अपनाती है पर चूकि यहाँ हमारे पूज्य आचार्यो पर कलंक की तरह ये फर्जी आचार्य प्रकट हो गए है, जिनसे धर्म एवं समाज का विघटन ही होगा और हो रहा है इसलिए इस पर हम सबको निर्णय लेना ही होगा |
यह फर्जी आचार्य भी अपने आपको सही साबित करने के लिए सही आचार्यो के चित्र अपनी प्रवचन सभा में लगवाएगे, उनकी जयजयकार करेंगे और धीरे से सच्चे आचार्यो की आड़ में अपनी फर्जी परंपरा को पुष्ट करेंगे| अगर आप इसके पीछे का सच जानेगे तो कुछ गुरु-शिष्यों को तुरंत कपरे पहनादेंगे एवं पुलिस के हवाले कर देंगे......पर इसमें सबसे ज्यादा दोष है उन राष्टीय संस्थाओ के पदाधिकरियो का जिन्होंने सत्य को समाज के सामने नहीं आने दिया और ऐसे गुरु-शिष्यों को उनके काले कारनामो का उजागर करने का भय दिखाकर आज भी ब्लेकमेल किया जा रहा है !
आज हम जैन एकता की बाते करते है पर ध्यान रखिये की जो हमारे दिशा निर्देशक है वह ही अगर कलंकित हो जाए तो धर्म एवं समाज दोनों के लिए यह गर्त में ले जाने वाले होंगे -
हम क्यों नीचे जा रहे है आज....
हमारी बात सरकार क्यों नहीं सुनती ....
जैन समाज में एकता क्यों नहीं है ....
क्यों वर्तमान में जो एक साधू कहता है, कुछ साधू उसे गलत कह रहे है और हम आगम का ज्ञान न होने से तटस्थ बने हुए है ....
क्योकि इन फर्जी आचार्यो ने अपने आपको सही साबित करने के लिए हर तरीका अपना लिया है और कुकरमुत्तो की तरह उगकर ये आज धर्म एवं सारे समाज को गर्त में ले जा रहे है
बंधुओ आज भी वीसवी सदी के प्रथ्माचार्य चा. च. शांतीसागर जी की परंपरा निर्विवाद चल रही है, इसमें आचार्य विद्यासागर जी, वर्धमान सागर जी, विद्यानंद जी प्रसिद्ध आचार्य है एवं इसी प्रकार आचार्य शान्तिसागर जी छाणी जी की परंपरा में पूज्य आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज प्रमुख है ............
क्या मुनि नियमसागर जी, क्षमासागर जी, सुधासागर जी, समतासागर जी, प्रमाणसागर जी एवं अन्य लगभग १०० से ऊपर साधू जो की २५ से ३५ साल पहले दीक्षीत है, में ज्ञान कम है जो वो आचार्य नहीं बने या गुरु में बुराई है ..........क्या आचार्य कुन्दकुन्द, समन्तभद्र, जिनसेन, वीरसेन, अकलंकदेव आदि में खोट है जो उन्होंने पद को त्यागे विना अपने शिष्यों को आचार्य नहीं बनाया, और न ही इस प्रकार शिष्य बने !
इन सच्चे साधुओ को नीचा दिखाने की कोशिश हो रही है, कहा जा रहा है की देखो तुम्हारे गुरु ने तुम्हे क्या दिया ? हमारी परंपरा में आओ और आचार्य क्या.........गराधीपति गर्धराचार्य कहलाओ ............हमें देखो जो खुले सांड (विना किसी कि आज्ञा) जैसे घूम रहे है....न किसी की आज्ञा चाहिए, ना किसी का ज्ञान और हम स्वयं भगवान
अगर मेरे लिखने से किसी को बुरा लगा हो तो आपकी क्षमा का पात्र हु,
"अभी समय है सुधार कर लो ये आनाकानी नहीं चलेगी ,
सही की नक़ली मुहर लगाकर ग़लत कहानी नहीं चलेगी ,
घमण्डी वक़्तों के बादशाहों बदलते मौसम की नब्ज़ देखो ,
महज़ तुम्हारे इशारों पे अब हवा सुहानी नहीं चलेगी ,
किसी की धरती,किसी की खेती,किसी की मेहनत,फ़सल किसी की ,
जो बाबा आदम से चल रही थी , वो बेईमानी नहीं चलेगी | (Uday Prapat ji)
कोई भी मूल्य एवं संस्कृती तब तक जीवित नहीं रह सकती, जब तक की वह आचरण में न हो !
झूठ कहते है वह लोग जो दूसरे सम्प्रय्दाय के उदय को अपनी आस्था के पतन का
कारन मानते है,
आस्था तुम्हारी थी, वह डिग कैसे सकती है ?
और यदि तुम्हारी आस्था को सत्य का आधार नहीं है तो उसका पतन होना ही चाहिए..

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